
अरावली पहाड़ियों के संरक्षण को लेकर राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली में लगातार विरोध-प्रदर्शन जारी हैं। बुधवार को कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर अरावली की नई परिभाषा को लेकर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि अरावली की जिस नई परिभाषा को लागू किया जा रहा है, उसका देश की प्रमुख संस्थाओं ने विरोध किया है।
कांग्रेस का सवाल:
कांग्रेस ने केंद्र से पूछा है कि वह अरावली को दोबारा परिभाषित करने पर क्यों जोर दे रही है और यह बदलाव किसके हित में किया जा रहा है। पार्टी का कहना है कि अरावली भारत की अमूल्य प्राकृतिक धरोहर हैं और इनके संरक्षण से समझौता करना देश के भविष्य के लिए खतरे जैसा है। नई परिभाषा को लेकर राजनीतिक और पर्यावरणीय चिंताएं बढ़ रही हैं, जिससे यह मुद्दा और बड़ा विवाद बन सकता है।
पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता:
विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली केवल ऊंची चोटियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके निचले हिस्से और आसपास के क्षेत्र भी जलवायु संतुलन, भूजल रिचार्ज, जैव विविधता और मिट्टी की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण हैं। यदि इन हिस्सों को कानूनी संरक्षण से बाहर किया गया, तो उत्तर भारत में पानी की किल्लत और प्रदूषण की समस्या और गंभीर हो सकती है।
केंद्र सरकार का पक्ष:
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर जानबूझकर गलत जानकारी फैलाई जा रही है। उन्होंने बताया कि सरकार अरावली की संरक्षण नीति पर लगातार काम कर रही है और पर्यावरण तथा अर्थव्यवस्था दोनों का संतुलन बनाए रखने के प्रयास में लगी है। यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में ग्रीन अरावली को बढ़ावा दिया गया है और सरकार का दावा है कि अरावली क्षेत्र का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा संरक्षित रहेगा।
नई परिभाषा:
सरकार के अनुसार, किसी क्षेत्र को अरावली पहाड़ी तभी माना जाएगा जब उसकी ऊंचाई आसपास की जमीन से कम से कम 100 मीटर अधिक हो। इसके अलावा, अरावली रेंज की पहचान दो या अधिक पहाड़ियों के समूह के रूप में की गई है, जो 500 मीटर के भीतर एक-दूसरे से जुड़ी हों। विशेषज्ञ और पर्यावरण कार्यकर्ता इस पर आपत्ति जता रहे हैं, क्योंकि इससे ढलान, छोटी पहाड़ियां और भूजल रिचार्ज क्षेत्र कानूनी संरक्षण से बाहर हो सकते हैं।
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