
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व भारतीय व्यापार सेवा (ITS) के एक अधिकारी को तय समय से करीब 5 साल पहले जबरन रिटायर करने के फैसले को रद्द कर दिया है। अदालत ने इस कार्रवाई को मनमाना और दुर्भावनापूर्ण माना। साथ ही केंद्र सरकार को अधिकारी को मानहानि के लिए 9 लाख रुपये और मुकदमे के खर्च के तौर पर 6 लाख रुपये देने का आदेश दिया है। इस तरह अधिकारी को कुल 15 लाख रुपये मुआवजा दिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजे के अलावा केंद्र सरकार को यह भी निर्देश दिया है कि डायरेक्टर जनरल ऑफ विदेश व्यापार (DGFT) अधिकारी को कार्यालय बुलाकर पूरे सम्मान के साथ विदाई दें।
1989 बैच के इस अधिकारी का सर्विस रिकॉर्ड शानदार और बेदाग रहा था। उन्हें लगातार बेहतर ग्रेडिंग मिलती रही थी। फरवरी 2018 में यूपीएससी की मंजूरी और योग्यता के आधार पर उन्हें 'संयुक्त सचिव' के पद पर प्रमोट किया गया था।
हालांकि, प्रमोशन के केवल दो महीने बाद 10 मई 2018 को उन्हें फंडामेंटल रूल 56(j) के तहत तय रिटायरमेंट उम्र से करीब 5 साल पहले ही जबरन रिटायर कर दिया गया। सरकार की एक रिव्यू कमेटी ने कुछ पुराने गोपनीय नोटों का हवाला देते हुए उन्हें निकम्मा बताया था।
समय से पहले रिटायर किए जाने और 'निकम्मा' बताए जाने के खिलाफ अधिकारी ने पहले सेंट्रल प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (CAT) का रुख किया। इसके बाद उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दोनों जगह से राहत नहीं मिलने के बाद अधिकारी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपंकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने अपने फैसले में कार्रवाई पर सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि जिस अधिकारी को यूपीएससी की मंजूरी के साथ योग्यता के आधार पर महज दो महीने पहले प्रमोट किया गया था, उसे अचानक बिना किसी नए नकारात्मक साक्ष्य के 'निकम्मा' कैसे घोषित किया जा सकता है।
अदालत ने कहा कि एक ओर विभाग अधिकारी को उच्च जिम्मेदारी वाला पद देकर प्रमोट करता है और दूसरी ओर केवल दो महीने बाद उसे डेडवुड बताकर सेवा से बाहर कर देता है। कोर्ट के मुताबिक, दोनों कदम एक-दूसरे के विपरीत हैं और एक साथ नहीं चल सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई से पता चलता है कि अधिकारी के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण और मनमाने तरीके से शक्ति का इस्तेमाल किया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का गलत इस्तेमाल करते हुए किसी अधिकारी को बिना ठोस आधार के जबरन रिटायर नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि अधिकारी को सेवा से जुड़े सभी लाभ उसी तरह दिए जाएं, जैसे उन्हें कभी अनिवार्य रूप से रिटायर किया ही नहीं गया हो। अगर इस दौरान उनके किसी जूनियर को प्रमोशन मिला है, तो अधिकारी को भी नॉटेशनल प्रमोशन का लाभ दिया जाएगा।
इसके अलावा अदालत ने आदेश दिया कि डायरेक्टर जनरल ऑफ विदेश व्यापार की ओर से अधिकारी को कार्यालय बुलाया जाए और उन्हें उसी तरह पूरे सम्मान के साथ विदाई दी जाए, जैसी उन्हें अपनी सुपरएनुएशन के दिन मिलनी चाहिए थी।
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