
नेपाल में भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में आई विनाशकारी बाढ़ सामान्य बारिश की वजह से नहीं आई थी। नेपाली वैज्ञानिकों की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हुए हिमस्खलन और भूस्खलन के कारण बर्फ, चट्टान और मलबा एक साथ नीचे आया, जिससे यह बाढ़ आई। नेपाल पर्यावरण सोसायटी के आग्रह पर तैयार की गई यह रिपोर्ट रविवार को जारी की गई।
अध्ययन के मुताबिक, रसुवा के लांगटांग-लिरुंग क्षेत्र में करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से बर्फ, चट्टानों और मलबे का एक बड़ा हिस्सा नीचे गिरा और ल्हेंदे नदी में जा पहुंचा। इसके बाद तेज बहाव भोटेकोशी नदी से होकर त्रिशूली नदी तक पहुंचा और रास्ते में बड़ी मात्रा में मलबा भी अपने साथ बहाकर ले गया।
26 अगस्त को आई इस आपदा ने नेपाल के उत्तरी और मध्य हिस्सों के कई कस्बों और गांवों में भारी नुकसान पहुंचाया था। अधिकारियों के अनुसार, नेपाल में अचानक आई बाढ़ से मरने वालों की संख्या सोमवार को बढ़कर 903 हो गई है। शवों की तलाश और बरामदगी का काम अब भी जारी है।
रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि यह आपदा ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी ग्लेशियल झील फटने के कारण नहीं हुई। शोधकर्ताओं ने उपग्रह तस्वीरों के साथ जल विज्ञान और मौसम संबंधी आंकड़ों, भू-भाग की विशेषताओं तथा नदी तंत्र में ऊंचाई और ढलान में हुए बदलावों का अध्ययन किया। जांच में ग्लेशियल झील के फटने से आई बाढ़ का कोई प्रमाण नहीं मिला।
अध्ययन के अनुसार, बुधवार सुबह करीब 8:37 बजे लांगटांग-लिरुंग के उत्तरी हिस्से से बर्फ और चट्टानों का विशाल हिस्सा नीचे गिरना शुरू हुआ। करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से यह तेज ढलान वाले क्षेत्र से नीचे आया और लगभग 2,930 मीटर की ऊंचाई पर ल्हेंदे नदी में जा गिरा।
उपग्रह तस्वीरों में करीब 10 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में बड़े भौगोलिक बदलाव दिखाई दिए। वहीं, करीब 0.56 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले ग्लेशियर का एक हिस्सा भी टूटकर अलग हुआ।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इस घटना के पीछे की सटीक भूगर्भीय प्रक्रिया, पिघलती बर्फ की भूमिका और क्या ऊपरी हिस्से में नदी का पानी कुछ समय के लिए रुका था, इन सवालों का जवाब जानने के लिए मौके पर आगे जांच की आवश्यकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, बर्फ और चट्टानों से बना यह विशाल मलबा सात मिनट से कुछ अधिक समय में करीब 22 किलोमीटर की दूरी तय करके रसुवागढ़ी पहुंच गया। इसकी अनुमानित औसत गति 46.3 मीटर प्रति सेकंड यानी करीब 167 किलोमीटर प्रति घंटा रही।
रसुवागढ़ी से बेत्रावती के बीच इसकी रफ्तार कम होकर करीब 73 किलोमीटर प्रति घंटा हो गई। इसके बाद नीचे की ओर यह करीब 22 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से आगे बढ़ा। गति कम होने के बावजूद बहाव बड़ी मात्रा में चट्टान, तलछट और मिट्टी को अपने साथ लेकर आगे बढ़ता रहा।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि बाढ़ पहुंचने से कई घंटे पहले रसुवागढ़ी और स्याफ्रुबेसी क्षेत्रों में नदी का जलस्तर और बहाव कम हो गया था।
रसुवागढ़ी में सुबह पांच बजे से आठ बजे के बीच पानी का औसत स्तर घटा। वहीं स्याफ्रुबेसी में नदी का बहाव सुबह करीब सात बजे से कम होना शुरू हो गया।
रिपोर्ट के अनुसार, उस दिन ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में असामान्य रूप से भारी बारिश होने के भी कोई प्रमाण नहीं मिले। इससे यह धारणा कमजोर पड़ती है कि आपदा सिर्फ अत्यधिक बारिश या बादल फटने के कारण आई थी।
इस आपदा से नेपाल के जलविद्युत ढांचे को भी भारी नुकसान हुआ। नेपाल विद्युत प्राधिकरण के प्रारंभिक आंकड़ों का हवाला देते हुए अध्ययन में बताया गया कि 13 जलविद्युत परियोजनाएं और एक सौर परियोजना प्रभावित हुईं। इसके कारण करीब 431 मेगावाट की बिजली उत्पादन क्षमता व्यवस्था से बाहर हो गई।
सरकार के शुरुआती आकलन का हवाला देते हुए अध्ययन में आर्थिक नुकसान करीब तीन लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान जताया गया है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में हुए नुकसान का विस्तृत आकलन अभी जारी है।
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