
केरल उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को भारत निर्वाचन आयोग (EC) से यह स्पष्ट करने को कहा कि यदि कोई उम्मीदवार चुनाव के दौरान नफरत फैलाने वाला या सांप्रदायिक बयान देता है, जिससे किसी समुदाय या समाज को नुकसान पहुंचे, तो उसके खिलाफ क्या कार्रवाई होती है। यह सवाल अदालत ने उस याचिका की सुनवाई के दौरान उठाया, जिसमें भाजपा के गुरुवायूर विधानसभा सीट उम्मीदवार बी. गोपालकृष्णन पर कथित सांप्रदायिक बयान देने का आरोप लगाया गया था और आयोग की निष्क्रियता को चुनौती दी गई थी।
न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस ने याचिका की सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता गोकुल द्वारा 20 मार्च को दी गई शिकायत पर उचित कार्रवाई की जाए। अदालत ने आयोग को कहा कि यह निर्णय शिकायत मिलने के दो महीने के भीतर लिया जाए। सुनवाई में चुनाव आयोग ने बताया कि रिटर्निंग ऑफिसर की शिकायत के आधार पर भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ FIR दर्ज कर ली गई है और संबंधित प्रचार वीडियो भी हटा दिया गया है।
अदालत ने आयोग से पूछा, “जब कोई उम्मीदवार नफरती या सांप्रदायिक बयान देता है और इससे समाज, समुदाय या देश को नुकसान होता है, तो उसके खिलाफ क्या कार्रवाई होती है?” अदालत ने यह भी कहा कि आदर्श आचार संहिता लागू होने के कारण कई बार सरकारी मशीनरी ठप हो जाती है और न्यायालय के आदेश या वैधानिक जिम्मेदारियों का पालन नहीं होता।
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि आदर्श आचार संहिता केवल यह सुनिश्चित करती है कि चुनाव में किसी पार्टी को अनुचित फायदा न मिले। इसके कारण अदालत के आदेशों या कानूनी कर्तव्यों के पालन में बाधा नहीं आती।
याचिकाकर्ता गोकुल ने बताया कि उन्होंने 20 मार्च को आयोग से भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी, लेकिन कोई कार्रवाई न होने पर उन्हें अदालत का रुख करना पड़ा।
बी. गोपालकृष्णन के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 192 (दंगा भड़काने की नीयत से उकसाना) और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125 (चुनाव में वर्गों के बीच वैमनस्य फैलाना) के तहत मामला दर्ज किया गया है। विवादित वीडियो में कथित तौर पर भाजपा उम्मीदवार ने कहा कि गुरुवायूर सीट पर पिछले लगभग 50 वर्षों से हिंदू विधायक नहीं चुना गया और आरोप लगाया कि वामपंथी और कांग्रेस गठबंधन वहां इस समुदाय से उम्मीदवार नहीं उतारते।
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